Wednesday, April 27, 2011

साभार

लंदन.अमेरिकी अधिकारियों ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को आतंकवादी संगठन करार दिया है। अमेरिका का मानना है कि आईएसआई, अल-कायदा और तालिबान जितना ही खतरनाक संगठन है। अमेरिका द्वारा ग्वांतानामो बे में अफगानिस्तान और इराक से लाए गए बंदियों में अल-कायदा, हमास, हिजबुल्ला के आतंकियों के साथ आईएसआई के लोग भी शामिल थे।

लंदन के ‘दि गार्जियन’ अखबार ने एक रिपोर्ट में इसका खुलासा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘इनमें से किसी भी संगठन से जुड़ा होना आतंकवादी या विद्रोही गतिविधियों का संकेत है।’ अफगानिस्तान में आईएसआई द्वारा तालिबान की मदद करने की जानकारी भी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को मिलती रही है, यह खुलासा भी इस रिपोर्ट में हुआ है।

आतंक संकेतक सूची में भी शामिल : आतंक संकेतक सूची ‘मैट्रिक्स’ में आईएसआई को 36 अन्य आतंकी संगठनों के साथ रखा गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि यह सूची 2007 की है लेकिन आईएसआई को अभी भी इस सूची से नहीं हटाया गया।

बंदी बनाए गए आतंकियों ने की पुष्टि: ग्वांतानामो बे में 2007 में बंदी बनाकर भेजे गए आतंकी हारुन शिरजाद अल-अफगानी ने अधिकारियों को इस बारे में जानकारी दी है। उसने बताया कि 2006 में एक मीटिंग में उसके साथ पाकिस्तानी सेना और आईएसआई अधिकारियों ने हिस्सा लिया था। उसने यह भी बताया कि 2006 में ही आईएसआई अधिकारी ने एक आतंकी को अफगानिस्तान में हथियार पहुंचाने के लिए दस लाख रुपए दिए थे।

रिश्तों में पड़ सकती है दरार

आईएसआई को तालिबान का मददगार कहने पर पाकिस्तान में रोष की आशंका जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, ‘यह जानकारी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और आईएसआई के बदहाल रिश्तों को और ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी।’


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संजय कुमार
क्षेत्रीय प्रचार प्रमुख राजस्थान
Website: www.patheykan.in

Sunday, April 24, 2011

saabhar


सहसा यह विश्वास ही नहीं होता कि आजाद भारत के राजनेता किस दुस्साहस के साथ जनता द्वारा उठाये गये मुद्दों को नकारने में लगे हैं। क्या भ्रष्टाचार के समर्थन या विरोध के बारे में भी कोई दो राय भी हो सकती हैं ? यह साफ साफ समझे जाने की आवश्यकता है कि भारत की जनता के लिये ना तो बाबा रामदेव महत्वपूर्ण हैं और ना ही अन्ना हजारे। उसके लिये महत्व इस बात का है कि वह तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुकी है और यदि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस मुद्दे पर अपने पद को छोड़कर जनता के आव्हान में शामिल होते हैं तो भारत की जनता उन्हैं भी बाबा रामदेव और अन्ना हजारे की तरह अपनी पलकों पर बिठा लेगी। अब यह तय मनमोहन सिंह को करना है कि उनमें अपनी ईमानदारी को साबित करने का दम है भी या नहीं।

केन्द्र सरकार जिस प्रकार से भ्रष्टाचार को नकार रही है, उसके लिये भ्रष्टाचार का जीता जागता उदाहरण आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व0 वाई0 एस0 आर0 रेड्डी के पुत्र जगनमोहन रेड्डी ने प्रस्तुत किया है। आगामी 8 मई को कड्डपा लोकसभा क्षेत्र के लिये होने वाले उपचुनावों के लिए जगनमोहन रेड्डी ने निर्वाचन आयोग को अपनी संपत्ति 365 करोड़ रूपये बताई है, जबकि 2009 में जब उन्होंने निर्वाचन आयोग को अपनी संपत्ति मात्र 77 करोड़ रूपये बताई थी। मात्र 23 महिनों में ही उनकी संपत्ति 5 गुना तक बढ़ गई । यह याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि स्व0 वाई0 एस0 आर0 रेड्डी कांग्रेस सरकार के ना केवल मुख्यमंत्री थे, बल्कि कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी के विश्वासपात्रों में से भी एक थे। उनकी आकस्मिक मृत्यु के बाद उनके पुत्र को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री नहीं बनाया इसीलिये उन्होंने कांग्रेस को छोड़कर नइ पार्टी बना ली। इसके विपरीत दूसरी तरफ भारत के संभ्रांत नागरिक हैं जिनके द्वारा दिये गए आयकर से भारत सरकार को अब तक की सबसे बड़ी आय हुई है। हाल ही में एक समाचार ये भी आया है कि भारत सरकार को इस बार आयकर के रूप में 456 लाख करोड़ रूपयों की आमदनी हुई है। प्रश्न यह है कि भारत का रहने वाला नागरिक क्या इसलिये कर चुकाता है कि वह पैसा देश के विकास की बजाय इन नेताओं की जेबों में जाये।

दरअसल, भारत के राजनेताओं ने चुनावों को अपनी सुरक्षा का हथियार बना लिया है। ये लोग पैसे के बल पर ही सत्ता प्राप्त करते हैं, और सत्ता में आने के बाद वही पैसा कमाने के लिए लोकतंत्र की कमियों का फायदा उठाते हैं। प्रश्न यह भी है कि क्या लोकतंत्र का अर्थ जनता की आवाज को अनसुना करना ही होता है, क्या चुनावों का उत्सव इसलिये मनाया जाता है कि देश को जाति, वर्ग , भाषा में बांटकर सत्ता सुख की प्राप्ति की जा सके, और जिन मतदाताओं ने राजनीतिक दलों को सत्ता चलाने का अधिकार दिया है, उनकी आवाज को घोंट दिया जाए। आखिर वो कौनसी शिक्षा है जिसके चलते जो भी व्यक्ति जनप्रतिनिधि निर्वाचित हो जाता है, वह सदन में पहुंचते ही जनता के मुद्दों को गौण समझने लगता है और सत्ता को सर्वोच्च । आखिर कैसे जनप्रतिनिधियों को सदन में पहुँचते ही यह विशिष्ट योग्यता हासिल हो जाती है कि वे जनता की मांगों को शासक की अवज्ञा के रूप में लेने के लिये स्वतंत्र हो जाते हैं और शासन के प्रति अवज्ञा को कुचलने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। इन राजनेताओं ने लोकतंत्र जैसे वरदान को अभिशाप में बदल दिया है, इसी कारण नागरिकों का एक बड़ा वर्ग मतदान के प्रति अरूचि व्यक्त करने लगा है।

पहले बाबा रामदेव और अब अन्ना हजारे को भ्रष्ट साबित करने में अपनी उर्जा को खपा रहे राजनीतिक दलों के राजनेता क्या यह साबित करना चाहते हैं कि जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलेगा, वे उस व्यक्ति को भी भ्रष्टाचार के दल दल में घसीट लेने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे । इसलिये जो भी व्यक्ति अपनी ईमानदारी को बचाकर रखना चाहते हैं वे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक शब्द भी न बोलें। क्या यह माना जाए कि यह जनता को शासक वर्ग से मिल रही धमकी है ?

यह स्पष्ट रूप से समझे जाने की जरूरत है कि जो लोग अन्ना हजारे के समर्थन में सड़कों पर उतरे थे, वे केवल प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में शामिल करने की मांग पर नहीं आये थे। वे चाहते थे कि अन्ना हजारे भ्रष्ट मंत्रियों और अधिकारियों के खिलाफ होने वाले लोकतान्त्रिक आंदोलन के ठीक उसी प्रकार वाहक बनें जैसा कि जयप्रकाश नारायण ने 1975 में इंदिरा गांधी के अलोकतांत्रिक व्यवहार व सरकार के विरूद्ध किया था। लेकिन सत्ता में बैठे लोग अपने प्रभाव और पैसे के कारण भारत के नागरिकों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।

अच्छा तो यह होता कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का दंभ भरने वाले राजनेता भ्रष्टाचार पर देश भर में चल रही बहस को देखते हुए इस मुद्दे पर संसद में बात करते, और जनता को यह विश्वास दिलाते कि भारत के राजनीतिक दल भी भ्रष्टाचार को जड़मूल से समाप्त करने के लिए कृतसंकल्पित हैं। प्रश्न यह है कि क्यों नहीं इस विषय पर सभी राजनीतिक दल अपने मतदाताओं को विश्वास दिलाने के लिये आमराय बनाते कि वे सब उस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए संकल्पित हैं, जो भ्रष्टाचार की जननि है।

क्या वे इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि भारत के नागरिक अवज्ञा पर उतर जायें और सरकारों को सभी प्रकार के कर देने से मना कर दें। क्यों नहीं भारत के तमाम राजनेता भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनमत संग्रह कराने का साहस दिखाते? या केन्द्र सरकार भ्रष्टाचार पर एक श्वेत पत्र जारी करती जो भारत की जनता को यह बता सके कि सरकार की नजर में देश में भ्रष्टाचार की क्या स्थिति है ? या जनता को ही यह अधिकार देते कि वह अपने द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधि को वापस भी बुला सकती है।

स्व0 प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी जब नए नए प्रधानमंत्री बने थे, तो उन्होंने यह कहने का साहस दिखाया था कि केन्द्र सरकार से चला एक रूपया गांव तक आते आते 15 पैसा रह जाता है, ये बात अलग है कि बाद में उन्हीं राजीव गांधी पर बोफोर्स तोप के सौदे में दलाली खाने का आरोप लगा। उसी तरह का साहस स्व0 राजीव की पत्नी श्रीमती सोनिया गांधी के मार्गदर्शन में चलने वाली मनमोहन सिंह की सरकार क्यों नहीं कर पा रही है? प्रश्न यह भी महत्वपूर्ण है कि श्रीमती सोनिया गांधी की ऐसी कौनसी दुविधा है, जो उन्हैं अपने स्व0 पति की व्यथा को दूर करने से रोक रही है। क्या यह माना जाए कि उनके मार्गदर्शन में चलने वाली सरकारों में हो रहे भ्रष्टाचार को उनकी स्वीकृति प्राप्त है?

जरूरत इस बात की है कि विभिन्न राज्यों में सत्ता का सुख भोग रहे और भोग चुके राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के बारे में अपने मत को स्पष्ट करें, इस मुद्दे उनकी टालमटोल की नीति का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे भ्रष्टाचार का समर्थन करते हैं और आज के हालात में भ्रष्टाचार को अपरिहांर्य मानते हैं। हमें यह याद रखना होगा कि इस देश ने सदियों से अपने उपर हुए आक्रमणों को झेलकर भी अपने आप को बचाए रखा है और जब आक्रमण घर के भीतर से ही हो रहा हो तो जनप्रतिक्रिया कैसी होगी इसके लिए राजनेता भारत का इतिहास एक बार फिर पढ़ लें। अब जवाब राजनेताओं को देना है, देश की जनता उनके निर्णय का इंतजार कर रही है।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

(लेखक सेंटर फार मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं

Wednesday, April 20, 2011

Devendra Dutta Mishra
............मैं कविता के दीप जलाता हूँ।
सूरज ढल रहा है,
सितारे दूर बैठे हैं।
थोडी सी रोशनी हो,
इसलिए मैं कविता के दीप जलाता हूँ।
इसलिए मैं कविता…….

दिशाएँ मौन बैठी हैं,
हवाएँ शान्त स्थिर है।
घुटन कुछ कम हो,
इसलिए मैं शब्द-चँवर झेलता हूँ।
इसलिए मैं कविता………

दुपहरी तेज है तपिस है,
नहीं किसी वृक्ष का छाँव भी।
भावना का पगा सिर पर हो,
इसलिए गीत मुकुट गढता हूँ।
इसलिए मैं कविता…………

थके है पाँव मन थका है,
पथ मे विश्राम-स्थल भी नही।
पुश्त को आराम थोडा मिल सके,
इसलिए संगीत मरहम मलता हूँ।
इसलिए मैं कविता………

बहुत बिखराव है मन में,
दरकते हुए रिश्ते हैं हृदय मे।
दिल को दिल से मिला पाऊँ,
इसलिए प्रेमधागे जोडता हूँ।
इसलिए मैं कविता………..

आवेश मे हैं लोग भृकुटि तनी है।
कोई किसी की सुनता नही।
दिलो के बीच संवाद फिर से हो सके
इसलिए प्रेमाक्षरो के पुल बनाता हूँ।
इसलिए मैं प्रेमगीत लिखता हूँ

ये वही अन्ना हजारे है |

saabhaar
Arvind Yogi
मेरा भारत प्यारा भारत

अन्ना हजारे कौन है ?
१ - ये वही अन्ना हजारे है जिन्होंने ठाकरे साहब के उर में सुर मिलाया यू पी और बिहारी मुंबई को बर्बाद कर रहे है !
२ - ये वही अन्ना हजारे है जिन्होंने वीडियो लाइव टेलीकास्ट लोकपाल बिल का होने का विरोध करते है !
३ - ये वही अन्ना जी जिन्होंने एक सपना देखा है एक महान नेता बनने का
बहुत सी ऐसी बाते है जिन्हें बताते हुए शर्म आती है कि भारत इए लोगो को आज भी अपना उद्धारक मानता है !
अन्ना हजारे को एक बहरूपिया चोर गिरगिट कुत्सित मनोविकारी विस्वह्घती और न जाने कितने ही शब्द कम पड़ जायेंगे
आइये सोचिये समझिये कुछ कीजिये नहीं तो ऐसे चोर हमारे भारत को बेच देंगे !
गर मुझे अन्ना को चोर कहने से कोई भी सजा मिली तो स्वागत है कि एक गंदगी को अ करने के लिए मेरा जीवन समर्पित हो जायेगा क्योकि ये जीवन तो मेरे मातृभूमि का ऋणी है देश के इतिहाश में ऐसे असामाजिक विस्वाहघती चोर नेताओं को चप्पलों कि माला पहननी चाहिए
मेरे प्रिय एवम आदरनीय श्री प्रवीण आर्य जी कुछ तो कीजिये इस चोर का नहीं तो देश का इतिहास आपसे हमेसा पूछता रहेगा कि आपकी कलम कहाँ सो गई थी आप खुद को माफ़ नहीं कर सकेंगे ! जय भारत जय भारतीय

श्री रामदेव जी क्यों नहीं किरण बेदी क्यों नहीं ?

saabhaar
Arvind Yogi
मै कौन हूँ ? क्यों हूँ ?
पहली बात कि मै भी एक आम भारतीय नागरिक हूँ कलम का एक छोटा सा उपासक हूँ !
१- अन्ना हजारे जी से मेरा कोई व्यक्तिगत मतभेद नहीं है हाँ लेकिन उनके जैसा कार्य गर कोई भी भारतीय करता है तो जरुर बोलूँगा भले ही कोई मुझे पागल कहे तो कहता रहे हाँ अर्क सिर्फ इतना पड़ेगा कि लोग कितने सवेंदनशील है ये जरुर सामने आएगा !
आप खुद सोचिये
१ - बाबा रामदेव या किरण बेदी जी के साथ आने से पहले अन्ना हजारे को कौन जनता था क्या आप जानते थे ?
२-लोकपाल बिल विधेयक लाने का प्रस्ताव बाबा रामदेव जी की समिति का उद्देश्य रहा है जिसमे अन्ना जी शामिल किये गए फिर समिति में वंशवाद क्यों हुआ कि इस समिति में राजनीती से सम्बन्ध रखने वाले लोग ही रखे गए है श्री रामदेव जी क्यों नहीं किरण बेदी क्यों नहीं ?
३- विधेयक पास होने का लाइव प्रसारण होने का विरोध अन्ना जी ने क्यों किया वो भी जब कांग्रेस भी यही बात कह रहा है आखिर जनता का बिल है तो फिर जनता से क्यों छिपाया जायेगा ?
४- इस समय इस प्रकरण से क्या बाबा रामदेव जी पूरी तरह से जुड़े हुए है या फिर उनको क्या कोई व्यक्तिगत स्वार्थ हो सकता है ! जी नहीं बाबा रामदेव जी को इस गंदगी का आभास हो गया है इसलिए वो दूर हो गए है इस गंदगी से हाँ अन्ना हजारे को स्वार्थ है ये साफ साफ देखा जा सकता है जो कि बाल ठाकरे अपनी राजनीती चमका सकते है कांग्रेस अपना बचाव कर सकता है ?
५- हमारे भारत का इतिहास रहा है जब भी कोई महान संत या राजनीती से अलग व्यक्ति राजनीती के खिलाफ खड़ा हुआ है उसके पीछे कूटनीति कि बिसात बीचा दी गयी है ! और यही हुआ है हमारे बाबा रामदेव जी के साथ !
६ - आज डाक्टर कुमार विश्वाश जी जैसे लोग क्यों दूर हो गए है इस पुरे प्रकरण से ?
७- अग्निवेश के बारे में कभी सोचा है आपने कि इसका इतिहास क्या रहा है ?
८- क्या सर्कार के पास जवाब था अपने सारे घोटालो से ध्यान हटाने का ये तो दुर्भाग्य है कि आवाज उठी जरुर लेकिन ना वक़्त अहि था और नहीं चुना गया व्यक्ति सही था अन्ना हजारे ने ना केवल बाबा रामदेव कि समिति को धोखा दिया है बल्कि सभी को धोखा दिया है कितनी हदों तक सरकार सफल हुई है अपने किये बुरे कार्यो को उधारने में ?
९- राजनीती कि पार्टी कोई भी हो सभी ने अपनी रोटी सेंकी है भोली जनता को तवे कि तरह तपा कर क्या ये सच नहीं है आज कोई भजी पार्टी विस्वाश के काबिल नहीं है ?
१०- कांग्रेस ने बाबा रामदेव जी के प्रयासों जानते हुए और इसकी गंभीरता को जानते हुए एक कूटनीतिक पारी खेली जिसमे वो सफल रही ! भोली जनता का ध्यान हटाना मात्र उनका उद्देश्य था सो उन्होंने बखूबी कर लिया ! अब विधेयक पास होना तो दूर कि बात है धीरे धीरे वक़्त के साथ होता रहेगा ! कांग्रेस कि सोची समझी राजनीती रही है अन्ना हजारे जैसे ऐसे व्यक्ति को बाबा रामदेव जी के पीछे लगाने की जो आसानी से सफल हुई ?

हो सकता है मै अपने विचारो से गलत हो जाऊ मुझे परवाह नहीं परन्तु भारतीय जनता के साथ गलत नहीं होना चाहिए भले ही अन्ना हजारे कुछ करे लेकिन गर वो समझते है कि जनता भेद है तो वो भूल जाये चलिए ९० % लोग नहीं मानेंगे सच्चाई को लेकिन जब आने वाले कल में उन्हें पता चलेगा इस पूरी राजनितिक प्रपंच के बारे में तो खुद को मजबूर और लाचार पाएंगे ! यह कड़वा सच है कि अन्ना हजारे राजनीती के मोहरे के सिवाय कुछ भी नहीं है ! गर मेरे विचारो से मैंने किसी को कस्ट पहुँचाया तो मुझे माफ़ कीजिये लेकिन आने वाले भारत का भविष्य ये राजनेता बर्बाद करके ही रहेंगे अगर हम इनके दांवपेंच से ना बच सके तो !
मेरा कलम ना किसी का गुलाम है और नहीं किसी राजनीती से सम्बन्ध रखता है रही बात भ्रस्ताचार के खिलाफ बोलने कि तो भ्रस्ताचार गर अपने सही रूप में रहे तो हर कोई समझ; सकता है लेकिन यदि यही आचार का रूप धारण कर ले तो भला कहाँ कोई जल्दी समझ सकता है ! ए मेरे भारत वासियों उठो जागो और जवाब दो आज फिर तुम्हारे बीच एक संत बाबा रामदेव जैसे लोगो को भी ए राजनेता अपनी कूटनीति से पराजित करना चाहते है !
आज हमारा दुश्मन कोई और नहीं हमरे घर में बैठा हमारा शाशक ही है जो हमें अपने हिसाब से चलाना चाहता है और हम उसके दांवपेंच में फंसते जा रहे है!
जागो भारत जागो जय भारत जय भारतीय ! अरविन्द योगी ९८७३२४८९८७

Friday, April 15, 2011

साभार

" दहेज़
निश्चय ही "देह व्यापार " है और दहेज़ ले
कर शादी करनेवाले दूल्हे / पति
"पुरुष वैश्या". लेकिन ताली दोनों हाथ
से बज रही है. जब तक सपनो के
राजकुमार कार पर आएंगे पैदल या
साइकिल पर नहीं तब तक दहेज़
विनिमय होगा ही
. जबतक लड़कीवाले लड़के के बाप के
बंगले कार पर नज़र रखेंगे तब तक
लड़केवाले
भी लड़कीवालों के धन पर नज़र डालेगे ही.
लडकीयाँ दहेज़ से लड़ना ही नहीं चाह
रहीं. सुविधा की चाह उन्हें संघर्ष की
राह से बहुत दूर ले आई है."-- राजीव चतुर्वेदी

साभार

" एक सूरज जो कल ही डूबा था तुम्हारे सामने
आज फिर से रोशनी के साथ आया है
अदालत वख्त की हो या विधानों की बताओ तुम कहोगे क्या ?
फलक पर दर्ज होते इस उजाले पर फेंक लो जितनी भी स्याही
तुहारे दिल की तारीकी की दहशत देख कर
तुम ही डूब जाना अपने चुल्लू भर गुनाहों में

एक सूरज जो कल ही डूबा था तुम्हारे सामने

आज फिर से रोशनी के साथ आया है.
" ---- राजीव चतुर्वेदी