Wednesday, April 20, 2011

श्री रामदेव जी क्यों नहीं किरण बेदी क्यों नहीं ?

saabhaar
Arvind Yogi
मै कौन हूँ ? क्यों हूँ ?
पहली बात कि मै भी एक आम भारतीय नागरिक हूँ कलम का एक छोटा सा उपासक हूँ !
१- अन्ना हजारे जी से मेरा कोई व्यक्तिगत मतभेद नहीं है हाँ लेकिन उनके जैसा कार्य गर कोई भी भारतीय करता है तो जरुर बोलूँगा भले ही कोई मुझे पागल कहे तो कहता रहे हाँ अर्क सिर्फ इतना पड़ेगा कि लोग कितने सवेंदनशील है ये जरुर सामने आएगा !
आप खुद सोचिये
१ - बाबा रामदेव या किरण बेदी जी के साथ आने से पहले अन्ना हजारे को कौन जनता था क्या आप जानते थे ?
२-लोकपाल बिल विधेयक लाने का प्रस्ताव बाबा रामदेव जी की समिति का उद्देश्य रहा है जिसमे अन्ना जी शामिल किये गए फिर समिति में वंशवाद क्यों हुआ कि इस समिति में राजनीती से सम्बन्ध रखने वाले लोग ही रखे गए है श्री रामदेव जी क्यों नहीं किरण बेदी क्यों नहीं ?
३- विधेयक पास होने का लाइव प्रसारण होने का विरोध अन्ना जी ने क्यों किया वो भी जब कांग्रेस भी यही बात कह रहा है आखिर जनता का बिल है तो फिर जनता से क्यों छिपाया जायेगा ?
४- इस समय इस प्रकरण से क्या बाबा रामदेव जी पूरी तरह से जुड़े हुए है या फिर उनको क्या कोई व्यक्तिगत स्वार्थ हो सकता है ! जी नहीं बाबा रामदेव जी को इस गंदगी का आभास हो गया है इसलिए वो दूर हो गए है इस गंदगी से हाँ अन्ना हजारे को स्वार्थ है ये साफ साफ देखा जा सकता है जो कि बाल ठाकरे अपनी राजनीती चमका सकते है कांग्रेस अपना बचाव कर सकता है ?
५- हमारे भारत का इतिहास रहा है जब भी कोई महान संत या राजनीती से अलग व्यक्ति राजनीती के खिलाफ खड़ा हुआ है उसके पीछे कूटनीति कि बिसात बीचा दी गयी है ! और यही हुआ है हमारे बाबा रामदेव जी के साथ !
६ - आज डाक्टर कुमार विश्वाश जी जैसे लोग क्यों दूर हो गए है इस पुरे प्रकरण से ?
७- अग्निवेश के बारे में कभी सोचा है आपने कि इसका इतिहास क्या रहा है ?
८- क्या सर्कार के पास जवाब था अपने सारे घोटालो से ध्यान हटाने का ये तो दुर्भाग्य है कि आवाज उठी जरुर लेकिन ना वक़्त अहि था और नहीं चुना गया व्यक्ति सही था अन्ना हजारे ने ना केवल बाबा रामदेव कि समिति को धोखा दिया है बल्कि सभी को धोखा दिया है कितनी हदों तक सरकार सफल हुई है अपने किये बुरे कार्यो को उधारने में ?
९- राजनीती कि पार्टी कोई भी हो सभी ने अपनी रोटी सेंकी है भोली जनता को तवे कि तरह तपा कर क्या ये सच नहीं है आज कोई भजी पार्टी विस्वाश के काबिल नहीं है ?
१०- कांग्रेस ने बाबा रामदेव जी के प्रयासों जानते हुए और इसकी गंभीरता को जानते हुए एक कूटनीतिक पारी खेली जिसमे वो सफल रही ! भोली जनता का ध्यान हटाना मात्र उनका उद्देश्य था सो उन्होंने बखूबी कर लिया ! अब विधेयक पास होना तो दूर कि बात है धीरे धीरे वक़्त के साथ होता रहेगा ! कांग्रेस कि सोची समझी राजनीती रही है अन्ना हजारे जैसे ऐसे व्यक्ति को बाबा रामदेव जी के पीछे लगाने की जो आसानी से सफल हुई ?

हो सकता है मै अपने विचारो से गलत हो जाऊ मुझे परवाह नहीं परन्तु भारतीय जनता के साथ गलत नहीं होना चाहिए भले ही अन्ना हजारे कुछ करे लेकिन गर वो समझते है कि जनता भेद है तो वो भूल जाये चलिए ९० % लोग नहीं मानेंगे सच्चाई को लेकिन जब आने वाले कल में उन्हें पता चलेगा इस पूरी राजनितिक प्रपंच के बारे में तो खुद को मजबूर और लाचार पाएंगे ! यह कड़वा सच है कि अन्ना हजारे राजनीती के मोहरे के सिवाय कुछ भी नहीं है ! गर मेरे विचारो से मैंने किसी को कस्ट पहुँचाया तो मुझे माफ़ कीजिये लेकिन आने वाले भारत का भविष्य ये राजनेता बर्बाद करके ही रहेंगे अगर हम इनके दांवपेंच से ना बच सके तो !
मेरा कलम ना किसी का गुलाम है और नहीं किसी राजनीती से सम्बन्ध रखता है रही बात भ्रस्ताचार के खिलाफ बोलने कि तो भ्रस्ताचार गर अपने सही रूप में रहे तो हर कोई समझ; सकता है लेकिन यदि यही आचार का रूप धारण कर ले तो भला कहाँ कोई जल्दी समझ सकता है ! ए मेरे भारत वासियों उठो जागो और जवाब दो आज फिर तुम्हारे बीच एक संत बाबा रामदेव जैसे लोगो को भी ए राजनेता अपनी कूटनीति से पराजित करना चाहते है !
आज हमारा दुश्मन कोई और नहीं हमरे घर में बैठा हमारा शाशक ही है जो हमें अपने हिसाब से चलाना चाहता है और हम उसके दांवपेंच में फंसते जा रहे है!
जागो भारत जागो जय भारत जय भारतीय ! अरविन्द योगी ९८७३२४८९८७

Friday, April 15, 2011

साभार

" दहेज़
निश्चय ही "देह व्यापार " है और दहेज़ ले
कर शादी करनेवाले दूल्हे / पति
"पुरुष वैश्या". लेकिन ताली दोनों हाथ
से बज रही है. जब तक सपनो के
राजकुमार कार पर आएंगे पैदल या
साइकिल पर नहीं तब तक दहेज़
विनिमय होगा ही
. जबतक लड़कीवाले लड़के के बाप के
बंगले कार पर नज़र रखेंगे तब तक
लड़केवाले
भी लड़कीवालों के धन पर नज़र डालेगे ही.
लडकीयाँ दहेज़ से लड़ना ही नहीं चाह
रहीं. सुविधा की चाह उन्हें संघर्ष की
राह से बहुत दूर ले आई है."-- राजीव चतुर्वेदी

साभार

" एक सूरज जो कल ही डूबा था तुम्हारे सामने
आज फिर से रोशनी के साथ आया है
अदालत वख्त की हो या विधानों की बताओ तुम कहोगे क्या ?
फलक पर दर्ज होते इस उजाले पर फेंक लो जितनी भी स्याही
तुहारे दिल की तारीकी की दहशत देख कर
तुम ही डूब जाना अपने चुल्लू भर गुनाहों में

एक सूरज जो कल ही डूबा था तुम्हारे सामने

आज फिर से रोशनी के साथ आया है.
" ---- राजीव चतुर्वेदी

साभार

Arvind Yogi posted in luckhnawi.
दो घूँट आंसू का  तन्हाई के साये में  ख़ामोशी कि नदी बहती है  दिल उसकी यादों में सूखे पत्तो पर  जो विरह व्यथा लिखती है खामोश चांदनी  रात में उसकी यादें  शबनम  बन आँखों कि मुडेरो से टपकती है  और एक नदी बह पड़ती है  उसकी यादों कि कोख से  जब हवाएं नदी में  नहाने के लिए आती है  शशि को अर्घ देती स्पर्श करती  तो एक घडी नदी के किनारे  वो पत्थर पर बैठ जाती हैं  उस समय नदी कि छाती से  चाँद कि किरणे कुछ कहती है  तब उसकी यादों में  यह खामोश नदी बहती है  आसमान में चमकते  प्यारे तारे   इस  नदी में खेलते है  बादल भी तैरते है सितारे भी उतरते है   पंक्षी भी पानी पीते है  और शशि का योगी अरविन्द  अपना कमंडल भरने को जब  नदी के किनारे आता है  दो घूँट आंसू का  आँखों में रमाता है  और उसकी यादो में  ख़ामोशी कि नदी में  कुछ पल को डूब जाता है  जब बाहर निकल कर आता है तो आँखों के सामने  वही ख़ामोशी की नदी बहती है उसकी यादों में जब पर्वत और घाटियाँ  गुजरे प्यार की गाथा गुनगुनाते है  तो खामोश यादो का दिल  इश्क बन धड़क जाता है  और योगी के  होंठो पर सिसकती    गुजरे लम्हों की गाथा  खामोश नदी में  प्रेम का तूफ़ान लता है उफान लाता है  योगी कह उठता है !  तुने ही हंसकर ज़िन्दगी की नदी पर  ख्वाबों का पुल बनाया था  और मुझे लाकर मझधार पर  दूसरा किनारा दिखाया था  और खुद को नदी की आगोश में समाया था  तब से उसकी याद में  यह ख़ामोशी  की नदी बहती है और योगी की छाती में  गुजरा इश्क धडकता है  विरह रगों में बसता है  तब नदी की ख़ामोशी में डूबी  उसकी शाशि का भी दिल धडकता है  फिर फिर उसकी यादो में ख़ामोशी की नदी बहती है  जो यादो के शाए में  कभी बहती कभी सूखती है  पर वो इतना जानती है  वह भी योगी के इश्क में  खामोश नदी सी बहती है  खामोश होकर भी  गुजरे वक़्त की गाथा कहती है  योगी शशि  की आगोश में  हर रोज नहाता  है  और दो घूट आंशू का  आँखों में रमाता है  और उसकी यादो में  ख़ामोशी की नदी में  हमेशा को डूब जाता है !  यह कविता क्यों ? दो घूट लेकर आंशू का जीवन के दो पहलू है ख़ुशी से मुस्कराओ या गम से मुस्कराओ मुस्कराना तो ज़िन्दगी है जो मुस्कान को नहीं जानता वो अपनी  या ज़िन्दगी की पहचान को नहीं जानता   अरविन्द योगी * यह कविता सभी प्रेमियों को सहृदय समर्पित   १४/०४/२०११
Arvind Yogi14 अप्रैल 23:54
दो घूँट आंसू का

तन्हाई के साये में
ख़ामोशी कि नदी बहती है
दिल उसकी यादों में सूखे पत्तो पर
जो विरह व्यथा लिखती है
खामोश चांदनी रात में
उसकी यादें शबनम बन
आँखों कि मुडेरो से टपकती है
और एक नदी बह पड़ती है
उसकी यादों कि कोख से
जब हवाएं नदी में नहाने के लिए आती है
शशि को अर्घ देती स्पर्श करती
तो एक घडी नदी के किनारे
वो पत्थर पर बैठ जाती हैं
उस समय नदी कि छाती से
चाँद कि किरणे कुछ कहती है
तब उसकी यादों में
यह खामोश नदी बहती है
आसमान में चमकते प्यारे तारे
इस नदी में खेलते है
बादल भी तैरते है
सितारे भी उतरते है
पंक्षी भी पानी पीते है
और शशि का योगी अरविन्द
अपना कमंडल भरने को जब
नदी के किनारे आता है
दो घूँट आंसू का
आँखों में रमाता है
और उसकी यादो में
ख़ामोशी कि नदी में
कुछ पल को डूब जाता है
जब बाहर निकल कर आता है
तो आँखों के सामने
वही ख़ामोशी की नदी बहती है
उसकी यादों में जब पर्वत और घाटियाँ
गुजरे प्यार की गाथा गुनगुनाते है
तो खामोश यादो का दिल
इश्क बन धड़क जाता है
और योगी के होंठो पर सिसकती
गुजरे लम्हों की गाथा
खामोश नदी में
प्रेम का तूफ़ान लता है उफान लाता है
योगी कह उठता है !
तुने ही हंसकर ज़िन्दगी की नदी पर
ख्वाबों का पुल बनाया था
और मुझे लाकर मझधार पर
दूसरा किनारा दिखाया था
और खुद को नदी की आगोश में समाया था
तब से उसकी याद में
यह ख़ामोशी की नदी बहती है
और योगी की छाती में
गुजरा इश्क धडकता है
विरह रगों में बसता है
तब नदी की ख़ामोशी में डूबी
उसकी शाशि का भी दिल धडकता है
फिर फिर उसकी यादो में ख़ामोशी की नदी बहती है
जो यादो के शाए में
कभी बहती कभी सूखती है
पर वो इतना जानती है
वह भी योगी के इश्क में
खामोश नदी सी बहती है
खामोश होकर भी
गुजरे वक़्त की गाथा कहती है
योगी शशि की आगोश में
हर रोज नहाता है
और दो घूट आंशू का
आँखों में रमाता है
और उसकी यादो में
ख़ामोशी की नदी में
हमेशा को डूब जाता है !

यह कविता क्यों ? दो घूट लेकर आंशू का जीवन के दो पहलू है ख़ुशी से मुस्कराओ या गम से मुस्कराओ मुस्कराना तो ज़िन्दगी है जो मुस्कान को नहीं जानता वो अपनी या ज़िन्दगी की पहचान को नहीं जानता अरविन्द योगी * यह कविता सभी प्रेमियों को सहृदय समर्पित १४/०४/२०११

साभार

रामदेव को ग़लतफ़हमी, समिति नहीं बदलेगी:
हज़ारे

लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर अन्ना हज़ारे के समर्थन में आने वाले योग गुरु बाबा
रामदेव ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि विधेयक के लिए गठित समिति में शांति भूषण
के होने पर उन्हें व्यक्तिगत तौर पर आपत्ति नहीं है. उनका कहना था कि लोगों ने इस
पर सवाल उठाए थे और उन्होंने लोगों की बात आगे पहुंचाई है.

विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए नागरिक समाज की ओर से पांच सदस्य हैं जिनमें
पूर्व क़ानून मंत्री शांति भूषण और उनके बेटे प्रशांत भूषण भी हैं.

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अन्ना हज़ारे ने कहा है कि इस समय मकसद लोकपाल
विधेयक का मसौदा तैयार करना है और समिति में कौन है कौन नहीं इस पर बहस नहीं होनी
चाहिए. हज़ारे ने कहा कि वे इस बारे में बाबा रामदेव से बात करेंगे कि देश हित में
वे इस सवाल को न उठाएँ.

सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे ने लोकपाल विधेयक को संसद के दोनों सदनों में
पारित कराने के लिए 15 अगस्त की समयसीमा रखी है.


saabhar

Murari Sharan Shukla posted in luckhnawi.
देखिये शांति भूषण की असलियत ! पढ़िए इस समाचार को ध्यान से आप सभी लोग ! स्वामी अग्निवेश की चालुगिरी के कारण अन्ना खा गए धोखा ! कौंग्रेस के इशारे पर अग्निवेश अन्ना के धरने में शामिल हुआ ! और अन्ना हजारे को प्रभावित करके अपनी मर्जी का फैसला भी करवा लिया ! इससे पता चलता है कि इस देश में देश का काम करने वाले देशभक्तों को कितनी सावधानी बरतने कि आवश्यकता है ? आप कभी भी भावनाओं के आधार पर हाइजैक हो सकते हैं ! लोग आपको आपके उद्येश्य से भटकने का पूरा हुनर जानते हैं ! इन देश द्रोहियों ने देश पर कब्ज़ा बनाये रखने का सारा हुनर सिख लिया है ! मेरे प्यारे देशवासियों अब आप लोग भी ऐसी सभी बातों को समझने का हुनर सीखो यथासिघ्र ! अभी हमें बहुत लम्बी लड़ाई लड़नी है ! और इस युद्ध यात्रा में ऐसे न जाने कितने भेड़ के खाल में भेड़िये मिलेंगे ! हमें सबको पहचानना होगा और इनके लाशों पर पग धर कर आगे बढ़ना होगा मेरे मित्रों ! अगर हम पहचानने में इसी तरह भूल करते रहे तो हमारा सारा मेहनत बेकार चला जायेगा ! और आन्दोलन के अंत में हम ठगे से रह जायेंगे ! भारत माता के बहादुर पुत्रों को केवल बहादुर होना ही पर्याप्त नहीं है हमें नीर-क्षीर विवेक भी सीखना पड़ेगा !
Murari Sharan Shukla15 अप्रैल 01:09
देखिये शांति भूषण की असलियत ! पढ़िए इस समाचार को ध्यान से आप सभी लोग ! स्वामी अग्निवेश की चालुगिरी के कारण अन्ना खा गए धोखा ! कौंग्रेस के इशारे पर अग्निवेश अन्ना के धरने में शामिल हुआ ! और अन्ना हजारे को प्रभावित करके अपनी मर्जी का फैसला भी करवा लिया ! इससे पता चलता है कि इस देश में देश का काम करने वाले देशभक्तों को कितनी सावधानी बरतने कि आवश्यकता है ? आप कभी भी भावनाओं के आधार पर हाइजैक हो सकते हैं ! लोग आपको आपके उद्येश्य से भटकने का पूरा हुनर जानते हैं ! इन देश द्रोहियों ने देश पर कब्ज़ा बनाये रखने का सारा हुनर सिख लिया है ! मेरे प्यारे देशवासियों अब आप लोग भी ऐसी सभी बातों को समझने का हुनर सीखो यथासिघ्र ! अभी हमें बहुत लम्बी लड़ाई लड़नी है ! और इस युद्ध यात्रा में ऐसे न जाने कितने भेड़ के खाल में भेड़िये मिलेंगे ! हमें सबको पहचानना होगा और इनके लाशों पर पग धर कर आगे बढ़ना होगा मेरे मित्रों ! अगर हम पहचानने में इसी तरह भूल करते रहे तो हमारा सारा मेहनत बेकार चला जायेगा ! और आन्दोलन के अंत में हम ठगे से रह जायेंगे ! भारत माता के बहादुर पुत्रों को केवल बहादुर होना ही पर्याप्त नहीं है हमें नीर-क्षीर विवेक भी सीखना पड़ेगा !

Tuesday, April 12, 2011

आज भी प्रासंगिक है ये उद्वोधन !

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ---- रामधारी सिंह 'दिनकर' ( 1908-1974)
सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता ? हां, मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

जनता? हां,लंबी - बडी जीभ की वही कसम,
"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।"
"सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?"
'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?"

मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता; गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं;
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।